आज का अखबार पढ़ते हुए मेरी नजर एक खबर पर पड़ी जिसमें लिखा था कि गवर्नमेंट ऑफिशल्स।
को यह लगता है कि इस बार ऑटोमोबाइल और ज्वेलरी की खरीदारी में बढ़ोतरी से भारत के कोने में एक सुधार की लहर आएगी क्योंकि ग्रामीण भारत में इस बार मानसून होने की वजह से फसल अच्छी हुई है और ग्रामीण भारतीय लोगों के पास खरीदारी के लिए काफी पैसा है।
यह खबर पढ़कर मुझे सरकार की नीतियों पर रोना आया। मैंने सोचा है कि यह गवर्नमेंट किसानों को देने के बजाय उन से पैसा निकालने पर ज्यादा फोकस कर रही है। इकॉनमी जो कि कोरोनावायरस की चलते ध्वस्त हुई खराब हुई या बर्बाद हुई जो भी है उसकी भरपाई के लिए।
यह लोग किसानों को टारगेट कर रहे हैं क्योंकि इस बार मानसून सही हुआ और उसके खेत में फसल अच्छी हुई। उसमें बीमारियां कम।
ठीक बात है भाई मानसून तो इस बार अच्छा हुआ था। असल में बीमारियां भी कम लगी थी। लेकिन आप की नीतियों की जो बीमारियां हैं जो दिमाग खाई हुई नीतियां हैं। आपकी उनकी वजह से भी उसका लाभ किसानों को ना पहुंच कर व्यापारियों को ही पहुंचा। शायद आपने यह सोचा होगा कि किसानों को लाभ पहुंच गया तो ग्रामीण तक बेटी की दुकान में अच्छी हो जाएगी और शहरी तबका फिर देखता रह जाएगा। इसीलिए आपने इस बार नीतियां कुछ इस तरह से बनाई कि ग्रामीण तक बे में लोगों के पास पैसा ना पहुंचकर वह पैसा व्यापारियों के पास पहुंच जाए। आपने धान का समर्थन मूल्य 1750 रुपए तय किया था। बहुत अच्छा फेवरेट है। पिछली बार के मुकाबले हालांकि ₹300 कम है। पूरे लेकिन फिर भी देखते हुए किसानों के मानसून का फायदा मिल रहा है तो आपको भी सस्ता खरीदना चाहिए था। खुद से थोड़ा ही कर रहे हैं। भगवान के सहारे खेती हो रही है। मेहनत तो लगती नहीं है। भगवान बरसा रहा है तो आपको भी अपना फायदा दिख रहा है। चलिए साहब आपने 17 सो रुपए धान की कीमत तय की बहुत सही किया। 17 सो रुपए कीमत तय करने के बाद जो ₹65 किलो लीटर।
डीजल चल रहा था। वह आप बढ़ाते बढ़ाते बढ़ाते बढ़ाते धान की बुवाई के शुरू के 20 दिन में ही आप ₹70 तक ले गए। ₹10 प्रति लीटर धान की सिंचाई का खर्च उसका भोज किस पर पड़ा। किसान पर उसकी जेब ढीली हुई जब बुवाई का टाइम आया। आपने ₹10 धीरे-धीरे करके एक ₹1 50 50 पैसे बड़ा-बड़ा कर आपने उसको ₹75 तक पहुंचा दिया। बहुत सही चलो थोड़ी थोड़ी मारे ₹10 तो महंगा हुआ है कौन सा? ज्यादा महंगा हुआ है। किसान कहकर तेल खरीदा गया सिंचाई करता है या बरसात भी हुई साथ साथ में सिंचाई भी बहुत में एक धान के खेत में इस बार। 10 पानी तो लग ही होंगे स्टार्टिंग से लेकर आखिर तक 10 पानी में आग जिसका 1 एकड़ में 5 लीटर तेल लगता होगा। एक बार में हालांकि लगता नहीं है। 1 एकड़ खेत में ज्यादा ही तेल लगता है। 8 लीटर तेल करीब 8 से 10 लीटर क्योंकि 1 बीघा खेत कम से कम एक से डेढ़ घंटे में रखा जाता है। एक घंटा इंजन चलाने के लिए 1 लीटर तेल की आवश्यकता तो होती ही होती है। इससे ज्यादा भी लग सकता है। चलिए साथ! बेटे का एवरेज लेकर चलते हैं। 7 घंटे किसी में पढ़ाई की 10 बार भराई की 70 घंटे तेल 70 लीटर तेल उसके पास से लगा 70 लीटर तेल उसने 10 लीटर।
₹10 प्रति लीटर महंगा खरीदा तो उसके जेब से गए ₹700 एक्स्ट्रा उधर आपने 3 साल पर प्रति कुंटल किए कम किए। इधर ₹700 एक्स्ट्रा उसकी जेब पर बोझ पड़ा। ठीक है। अब आते हैं मार्केट में धान पक कर तैयार हो गया। धन में जो लागत आई इस बार ईद में मकोड़ों की दवा और जिंक सल्फेट फास्फोरस पता नहीं क्या-क्या सब मिलाकर करीब? 20 से 25000 प्रति एकड़ लागत आई। प्रति एकड़ में इस बार मानसून अच्छा था तो फसल भी अच्छी होनी थी। भाई प्रति एकड़ में करीब 24 से 25 क्विंटल धान कटाने की 4 क्विंटल प्रति बीघा। धान कट गया धन कटने के बाद आप की मंडियों में।
सरकारी तालसुर नहीं हुई थी सरकारी तौर पर ही न्यूनतम समर्थन मूल्य पर। धान खरीदा जाता है। इसके अलावा यदि कोई प्राइवेट व्यापारी खरीदता है। दांत में सरकारी कीमतों पर नहीं खरीद था। वह मनमानी कीमत पर खरीदा है और जब एक बार कटाई शुरू हो जाती है तो किसान के पास इतनी भंडारण क्षमता नहीं है कि वह आपके यहां अपने यहां पर लाकर पहले धन को स्टोर कर ले और फिर जब धान का भाव आए। सरकारी कांटे स्टार्ट हो तब जाकर प्रधान को अपने गोदाम से निकाले और बेचने आए। किसान के पास यह सुविधा नहीं है। आप ने जगह-जगह भंडारण क्षमता के लिए स्टोर खोलने हैं। कोल्ड स्टोर भी खोले हैं। कच्चे फल सब्जियों के लिए पर वह किसान के नहीं है और वहां किसान नहीं रख पाता है। उसका कारण मैं किसी अगले पोस्ट में बताऊंगा। किसान लेकर अपनी धान की उपज को मंडी पहुंचता है। मंडी में बिचौलिए कहे या उन्हें प्राइवेट आरती एक हैं या प्राइवेट खरीदार के हैं। उसने किसान की बहन की कीमत लगाई। ₹1000 प्रति कुंटल आपके न्यूनतम समर्थन मूल्य से सीधा ₹750 कम न्यूनतम समर्थन मूल्य से ₹750 कम मिलने पर जब ₹1000 पर भी आपका मन नहीं भरा तो आपने उसमें भी नवीन के नाम पर धान हरा है। इस नाम पर अभी धान में गर्दा ज्यादा है। इस नाम पर उसको ले जाकर कहीं ₹900 प्रति कुंटल खरीदा। अब आप हिसाब लगाएं। ₹900 प्रति कुंटल कोई धान बेचकर आया 25 क्विंटल धान। हाईएस्ट के खेत में हुआ 4 क्विंटल बीघा का। ₹900 प्रति क्विंटल उसने भेज दिया ₹22500 का धनुष के खेत में हुआ जबकि उसकी लागत कितनी आई थी ₹25000 भाई साहब आप तो खेत की लागत ही नहीं रिटर्न कर पाए और उसके बाद जो 3 महीने का किसान के घर कि आज ही पकाती वह कहां से चलाएगा? कहां से हो?
दुकान पर दवाइयों के पैसे पूरे करेगा। आपकी सरकारी ताल शुरू हुई। इसी बीच एक टूबर को सरकारी तौल शुरू हो गई थी। सरकारी आंकड़ों में हालांकि व्यापारियों ने 1 अक्टूबर से धन लेने स्टार्ट नहीं किए थे, लेकिन फिर भी डीएम साहब हमारे यहां बहुत तेज तर्रार है। उन्होंने तो एक ही जांच की जहां तहां जाकर। आज का हाल है। की ट्रॉली अगर सरकारी तौर पर जा रही है तो उसको किसी भी तरीके से बहाने बनाकर कोई भी कारण काल के कोई भी मजबूरी दिखा कर उसको कैसे भी प्राइवेट कॉल पर भेजना है। सरकारी तौर पर केवल वह धान तो लेंगे जो प्राइवेट व्यापारी लेकर इकट्ठा करेंगे और उनके नाम से नहीं चलेंगे। व्यापारियों के नाम से वह किसानों के नाम से देंगे जिनकी खतौनी और आधार कार्ड यह प्राइवेट व्यापारी खरीद खरीद ले लेकर रख रहे थे और जिनका ध्यान हजार रुपे प्रति कुंटल में खरीद रहे थे। इनके धान सरकारी दौरों पर चलेंगे और एक साथ ट्रक के ट्रक लेंगे। किसी किसान की क्या हिम्मत क्या मजाल जो अपनी ट्रॉली जाकर जाकर सीधा सरकारी तौर पर दिलवाया है क्योंकि सरकारी तौर पर अगर बोले जाएगा तो उसको कह दिया जाएगा कि आपके धान में नमी जाता है। कृपया इन्हें सुखाकर लेकर आएं। किसान को भाई बहुत टाइम है क्योंकि उसके पास बहुत सारे खेत खाली पड़े हैं। उसको खेत जोत मन ही नहीं है, कुछ नहीं करना है। एक दिन असल काटेगा। तीन-चार दिन फसल काट के उसको झाड़ आएगा। उसमें से ध्यान निकालेगा। प्रधानों को सुख आएगा। वहां पर धनु को सुखाकर सही से बिल्कुल बराबर नमी जो आपको चाहिए। उतनी करके आपके पास लाएगा। बार-बार ध्यान इधर से उधर ट्राली से खेत खेत से ट्राली में करेगा। तब जाकर हम धान खरीदेंगे और इतना नहीं कर पाएगा तो वह प्राइवेट किसी व्यापारी को बेच ही जाएगा। से हम खरीद लेंगे कितने अच्छा खेल खेला है?
धान का किसान इस बार कर्ज में पहुंच गया है। मानसून सही होने के बावजूद कारण आप की नीतियां कारण कोरोनावायरस कारण बिचौलिए जोगी सरकारी पोल खोलने से पहले धान खरीदने स्टार्ट कर देते हैं। कारण आप की व्यवस्था जो उन बिचौलियों को नहीं रोक पाई। कारण आपके सरकारी कारों की संख्या में कमी जिन पर अगर तोल होती भी है तो कब 5 दिनों के बाद कभी 10 दिनों के बाद कह कर ही बोल कर यह कह दिया जाता है कि हमारे पास 5 दिनों तक तोल के कोई वही नहीं लगता। डर ही नहीं है। यहां हमारे पास कॉल के कूपन ही नहीं है। एक तरफ आपका सरकारी। ब्रह्मचारी है जिसको आप ₹50000 महीना देते हो और उस कर्मचारी के पास अगर जनता पहुंचती है। कोई व्यक्ति पहुंचता है। अपनी समस्या लेकर और उसको बोल देता है कि सर एक फाइल एक्स्ट्रा लगेगी। इसको खोल कर देख लीजिए या मुझे देखने दीजिए तो वह कर्मचारी उससे खुश मांगने में। जरा भी देर नहीं लगाता है।
₹50000 प्रति माह पाने वाला कर्मचारी 5 मिनट के लिए फाइल खोल कर नहीं देख सकता है। एक उसके समय की इतनी वैल्यू कर दी। आपने उसको पाल पोस कर नौकरशाहों को इतना बड़ा बना दिया कि उन्हें 5 मिनट का समय देने के लिए भी एक्स्ट्रा पैसे चाहिए। उन्हें ₹50000 तनखा कम पड़ जाती है। दूसरी और किसान हैं आप उसकी ट्राली खेत से लगभग आओगे। फिर कहोगे कि इस को सुखाकर लाओ। फिर कहोगे कि इसमें नहीं जाता है। इसमें गरबा कम करके लाओ। इतना टाइम है क्या किसान के पास? उस कर्मचारी के पास टाइम इस कर्मचारी का टाइम कितनी वैल्यू है, किसान के टाइम की कोई वैल्यू नहीं है।
भगवान किसान को दे रहा है तो क्या उस में किसान की मेहनत कम लगती है? उसको फाइल उठाकर खोलने में इतनी मेहनत लग जाती है कि उसके लिए फाइल उठाने का अलग से पैसा चाहिए। किसान के पैसे की तो आपने कोई कदर ही नहीं कि किसान का जो न्यूनतम समर्थन मूल्य जो कि उसका हक होना चाहिए। हक है ना मिलना ही मिलना चाहिए। उसमें से भी आप कटौती पर कटौती करते जा रहे हैं कि इसमें अभी लेबर चार्ज कटेगा। इसमें करदा कटेगा। इसमें नबी के नाम पर कटेगा। कितनी कटौती कर दी इतनी कटौती कर दी गई। 1750 रुपए वाला धान आपका ₹900 प्रति क्विंटल वाला धन रहेगी।
किसान को बेवकूफ समझा है या आप किसान को खैरात बांट रहे हैं, उसकी मेहनत का नहीं दे रही। किसान मालिक हैं, इसीलिए सह रहा है।
पर सहने की भी हद होती है। महाराष्ट्र में किसानों ने यूं ही आत्महत्या करना स्टार्ट नहीं कर दिया है। 1 दिन का नहीं, एक नीति का नहीं, 5 साल का नहीं। यह 50 से 60 साल की कहानी आप धीरे-धीरे धीरे-धीरे किसान को कमजोर करते हैं। और नौकरशाहों को पाल पोस कर इतना बड़ा कर दिया कि उन्हें अपने फोन हिलाने का भी पैसा चाहिए। अगर वह कुर्सी से उठ कर उन्हें फाइल खोलने भी पड़ जाए तो बने इसके लिए अलग से घूस चाहिए।
यह व्यवस्था नहीं कैंसर फैला दिया है आप?
उसे व्यवस्था नहीं कह सकते।
हमारे बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि सन 1973 में एक सरकारी नौकर की तनख्वाह इतनी होती थी जितना कि गेहूं या धान की कीमत प्रति कुंटल होती थी। इन्हीं की एक कुंटल धान की कीमत वाला बंदा इसके पास 1 क्विंटल धान है। वह एक सरकारी नौकर के बराबर खड़ा था और आपने क्या कर दिया। सरकारी नौकर जो गेट पर खड़ा होता है। केवल चपरासी की ड्यूटी करता है। मानव अधिकार के नाम पर उसको ₹25000 ₹30000 तक की खबर महीने पहुंचा दिया। दूसरा किसान है उसके मानव अधिकार है नहीं, वह माना भी नहीं है, वह तो किसान है। उसकी फसल को न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी आदेश आधी कीमत में खरीदेंगे। उसको न्यूनतम समर्थन मूल्य भी नहीं देंगे। जो न्यूनतम तय है उसकी फसल का वह भी नसीब नहीं है। इतना लाचार मत बनाओ किसान को कि किसान आंदोलन कर दें। यदि किसान ने आंदोलन कर दिया।
तो कहीं के भी नहीं रहोगे? यह अमेरिका और न्यूजीलैंड ऑस्ट्रेलिया के डॉलर जहां पर इकट्ठी कर रखे हैं। विदेशों में अपनी कंप्यूटर इंजीनियर भेज भेज कर। अगर किसान ने अपनी फसल मार्केट में बेचना बंद कर दी तो यह डॉलर राम के कम पढ़े जाएंगे। विदेशों से गेहूं और चावल खरीदने में।
किसान को उसका हक दे दीजिए उसको ज्यादा मत दबाइये

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